Paresh Tiwari

विरह

परेश तिवारी की हाइबुन ‘सैपरेशन' का हिंदी अनुवाद

उस दिन तुमने सब समेटा

तर्क, झगड़े

 

बड़े करीने से उन्हें तह किया

ग्लानि की करारी सिलवटों के साथ

तुमने उन्हें एक सूटकेस में भरा और चल दिए

पीछे छोड़ते हुए

खाली क़तारें हैंगरों की

जिस पर मैं लपेटता हूँ

 

लाचार चुप्पी

मैं हर रात अपने शरीर को छीलता हूँ

 

 

कसैली कॉफी

दिन के चाँद से अंकुरित होती

तुम्हारी अनुपस्थिति

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translation & art: teji sethi

पेशे से नौसेना अधिकारी, रचनात्मक लेखक, रुचि से इलस्ट्रेटर, परेश तिवारी लखनऊ की गलियों में पले-बढ़े। एक पुशकार्ट पुरस्कार नामांकित कवि परेश ने कविता के दो व्यापक रूप से प्रशंसित संग्रह प्रकाशित किए हैं। उनकी पहली पुस्तक, 'एन इंच ऑफ स्काई' २०१४ की में प्रकाशित हुई थी और इसे इंडियाना राइटर्स सेंटर, यूएसए में हाइकु और हाइबुन के लिए संसाधन सामग्री के रूप में उपयोग किया जाता है। 'रेनड्रॉप्स चेज़िंग रेनड्रॉप्स', हाइबन और हाइब्रिड कविताओं के उनके नवीनतम संग्रह को 'टचस्टोन प्रतिष्ठित पुस्तक पुरस्कार' - २०१७ में एक सम्मानजनक उल्लेख मिला है। परेश ने कई बार सहकर्मी-समीक्षा की गई हाइकु प्रतियोगिताओं को जीता है, और उनकी हाइकु को विभिन्न प्रतियोगिताओं और समीक्षाओं में मान्यता दी गई है। सबसे उल्लेखनीय २०१६ में व्यक्तिगत कविता के लिए उनकी हाइकु को ‘टचस्टोन अवार्ड' के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था।

featured poet -July 2022

featured poet - December 2021

featured poet - February 2022

Vinita Agrawal

लेकिन एक फूल

विनिता अग्रवाल की कविता 'बट अ फ्लावर' का हिंदी अनुवाद

 

मुझे पच्चीस साल बाद मिलता है

वेबस्टर शब्दकोश के पन्नों के बीच दबा - एक फूल

 

यह अब एक पिचकी हुई मकड़ी की तरह दिखता है

बिंदु जैसा शरीर, पैरों जैसे दिखते - पतले पुंकेसर

एक - आयामी और कागजी

                        एक रिश्ते के अंत की तरह।

 

सुर्ख पीले रंग से

जंग जैसे भूरे रंग का हो गया

दर्द से फड़फड़ाता है, हल्के से स्पर्श पर

टूटे हुए दिल की तरह

 

शब्दकोश के सभी अच्छे शब्द भी

न समेट सके उसे

वह धंस गया सिलवटों के क्लौस्ट्रफ़ोबिया में

अब वह वनस्पति नहीं, जीव जैसा दिखता है

 

वनस्पति विज्ञान नहीं प्राणी विज्ञान

उस प्रेम की तरह जो पोषित नहीं होता

 

अब सोचती हूँ

कोई भी इसे लैपल पर नहीं पहनेगा

गुलदस्ते में नहीं सजाएगा

इससे गालों को नहीं सहलाएगा

या डूबेगा इसकी सुगंध में

इसने अपना अस्तित्व खो दिया है

जिस तरह चीजें खोती हैं, जब समय पर छोड़ दी जाएं

 

काश यह एक फूल ही रह जाता

एक मृत फूल, लेकिन एक फूल।

Image by Luc van Loon

विनीता अग्रवाल कविता की चार पुस्तकों की लेखिका हैं, जिनमें नवीनतम हैं - "टू फुल मून्स"। वह उसावा लिटरेरी मैग के साथ कविता संपादक हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन पर एक एंथोलॉजी का संपादन किया है जिसका शीर्षक है - "ओपन योर आईज" और वह "द ईयरबुक ऑफ़ इंडियन पोएट्सरी इन इंग्लिश २०२१" की सह संपादक हैं । उन्हें २०१८ में साहित्यिक उत्कृष्टता के लिए टैगोर साहित्यिक पुरस्कार और २०१५ में गायत्री गा मार्श पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

pic: unsplash

Image by Motoki Tonn

Shailja Chandra

I have passed through this surgery a number of times. Mostly it has been skin-deep only. This is the first time it's an open-heart surgery - and Shailja is the Surgeon. She has touched deep down at the core of my poems

 

Says the Moonsmith himself

The Moonsmith Gulzar - orbiting the celebrated words

the body of Gulzar's literary works under the scalpel of a deft writer-surgeon Shailja Chandra

In the प्रस्तावना to her book, Shailja has gracefully laid out the simplest yet profoundest of prescriptions–--if you cherish a deep bond with Gulzar Saheb, the kind that is worn like a sacred तावीज़, आप इस किताब की तासीर को कुछ हद्द तक महसूस कर सकते हैं

 

 

कितना गहरा रिश्ता है गुलज़ार साहेब से यह तो पता नहीं, if Shailja has baptised him, the Moonsmith, I see myself as the tiniest speck of the same universe, that for light years had craved for her share of the Moon. उस रिश्ते के वास्ते से, I gather my guts and take a walk into this cosmos of mysteries.

 

holding within

the secrets of the cosmos

a falling star

What pulled me into reading this book is my love for celestial wonders. The title intrigued me. Tossing its pages, my eyes caught some terms that lured me further. For the past few years, I have immersed myself in the haikai literature (Japanese literature) that dwells on brevity. To my delight, I find pieces from his poetry scattered across the ether. In between the excerpts, are Shailja’s annotations exactly like a seasoned haiku critic gives a commentary on our haiku. It felt home.

 

 

Orbiting the celebrated words----in celestial mechanics, an orbit is the gravitationally curved trajectory of an object, such as the path of a planet around a star or a natural satellite around a planet. Here, Shailja orbits around Gulzar Saheb’s verses holding deftly her scalpel and pen. Believe me, a surgery so extensive can be intimidating. Her words shine effortlessly, without getting eclipsed in the process.

With a researcher's eye, I see it as a research paper with Gulzar Saheb's verses-----the source that nourishes her pen as she interprets them in her capacity as a surgeon and his protégé. As a poet I feel, she goes beyond the layers of the skin of his verses into the soul of his writing. I put her reflections in another haiku

 

there must have been dark

from where they come -----

fennel sprouts

She’s pulled by the musk of his words. She takes an exploratory approach and offers a fresh read into his already acclaimed verses. The themes she chooses to touch upon are the most obscure yet significant dimensions of ones existence-----khuda, sach, pyaar, maut, rishton ka taana baana and a blend of sensory perceptions-----poetic synesthesia that I have been researching on in the haikai literature these days.

lonely tonight ...

the blue of a ghazal

deepens

 

In her journey, she pauses around his words, breathes and bathes in them as one takes a dip in the waters of the holy Ganges. She refers to him as a Sufi - poet who offers his own vulnerabilities हम सभी दर्द से पैदा हुए हैं, despair, hopes rather than lofty ideals on existence, who explores the complexity of the ब्रह्माण्ड and the बड़े मियां. What she calls a masterstroke is his writings on an indifferent खुदा and His apathy towards mankind with incredible ease. ‘बड़े इरेटिक लगते हो, कायनात में कैसे लोगों की सोहबत में रहते हो?

In the same chapter, she offers a glimpse of the heightened awareness of his हैसियत in the cosmos. कितना छोटा मिरा कद है जैसे हर्फ़ से एक नुक्ता गिरा हो, captures his humility and his belief in the accidental and serendipitous occurrences in the Universe.

Shailja unfolds another chapter, where Gulzar Saheb talks of love with a blend of mysticism and pragmatism. Love----the journey between the things we long for and the thing that torments us. She, from her orbit captures the ever evolving/mutating emotions of love as he illuminates ‘कोई भी इमोशन एक तरह से नहीं रह सकता', It evolves into another emotion.

पनाह, the total surrender in love. ‘तुम्ही से जन्मूं तो शायद मुझे पनाह मिले, the most poignant and intimate of expressions I ever found from his nazm is deftly unraveled by him, in one of his conversations with Shailja, where he seeks to be born from the कोख of his beloved. What a marvel! As she travels further, she is enticed by the ताना बाना of this skillful जुलाहा. तेरे उतारे हुए दिन टंगे हैं लॉन में अब तक... allegorically he narrates the pangs of separation.

In haikai literature we dwell on makoto----the truth. In the chapter आइना of truth she explores his quest for reality ‘ऐसा नहीं होता है, जो अपनी सोच है वही है बस... and zoka----the natural reality of the continuum of creation, वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर, आदत इस की भी आदमी सी है.

Further, in the pages, resonates his voice where he contemplates about environment, soil and society. मोड़ पे देखा है वह बूढा- सा इक पेड़ कभी? मेरा वाकिफ है, बहुत सालों से में उसे जानता हूँ

मैं जंगल से गुज़रता हूँ तो लगता है मेरे पुरखे खड़े हैं ....

 

carrying a lifetime

in his womb

an old banyan

 

spring zephyr

caressing the wounds

of a barren tree

 

His verses can pierce a heart and heart of the matter with equal ease. मैं सिगरेट नहीं पीता मगर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि 'माचिस' है ?

 

The last three chapters speak of poetic synesthesia, kintsugi and the ultimate freedom-----death, each one of them reveals a new facet of his profound poetic persona. Kintsugi-----the art of retaining precious scars, as I call it, again is a Japanese art. गुलज़ार साहिब इन्हें नज्मों के टाँके कहते हैं, the creative process that works as golden joinery.

azure waters

fill the cracks of my poems

I heal

as this लौकिक यात्रा ends, I thank Shailja for offering this poetic प्रयाग to the pilgrims of literature.

मेरी यात्रा यहीं से आरम्भ होती है ....

teji

the haiku cited in the above article are my published works that have appeared in The Haiku Foundation, Usawa Literary Review, INNSAEI Journal.

Sukrita Paul Kumar

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ज़मीन के ऊपर

अज़ान के स्वर गूंज उठते हैं
भोर के धुँधलके में ...
ज्यों ही प्रकाश की किरणें प्रवेश करती हैं
गहरे स्लेटी बादलों में
जो अध-बैठे हैं, मुड़े घुटनों पर
नमाज़ अदा करने को
आसमान में

चिड़ियाएँ रात की निद्रा तोड़
अपने पंख फड़फड़ाती
घोंसलों से फुदक कर बाहर आती हैं
चाँद के नाज़ुक वक्र पर झूलती,
जप रही हैं चंद्र मास की चौदहवीं रात को

आकाश से लटक रहीं हैं
खुले कोष्ठक में पड़ी प्रार्थनाएं
इस क्षण
इस सुबह




 

सुकृता पॉल कुमार की कविता ‘अबव द ग्राउंड’ का हिन्दी अनुवाद 

translation & art: teji sethi

केन्या में जन्मी सुकृता पॉल कुमार वर्तमान में दिल्ली में रहती हैं, कविता लिखना, शोध करना और साहित्य सिखाने के अतिरिक्त उनकी कई रुचियां हैं। वे प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय लेखन कार्यक्रम, आयोवा विश्वविद्यालय (यूएसए), कैम्ब्रिज सेमिनार और भारतीय उन्नत अध्ययन संस्थान, शिमला की एक पूर्व फेलो रही हैं। सुकृता हांगकांग बैपटिस्ट विश्वविद्यालय, चीन में रेजिडेंट कवि के रूप में आमंत्रित की गयी थी।  सुकृता के प्रमुख महत्वपूर्ण कार्यों में  नैरेटिंग पार्टीशन, कन्वर्सेशनस ऑन मॉडर्निज्म, द न्यू स्टोरी, मैन एंड वुमन एंड्रोग्नी शामिल हैं। वे द इयर बुक ऑफ़ इंडियन पोएट्री इन इंग्लिश की सह संपादक हैं।

featured poet - November 2021